पंजाब में कांग्रेस की सियासत अपने पैर कुल्हाड़ी पर मारना

आने वाले विधानसभा चुनावों फरवरी 2027 के मद्देनजर पंजाब में सियासी रस्साकशी और जोर आजमाइश तेज हो गई है। कांग्रेस ने 2024 के लोकसभा चुनावों में यद्यपि एक बड़ी सफलता हासिल की थी लेकिन प्रदेश में अब आपसी कलह में उलझी हुयी है। पंजाब कांग्रेस की राजनीति में गहरा पेच फंस गया है। पूर्व विधायकों हल्का इंचार्ज और अन्य वर्तमान बड़े नेताओं का एक गुट चरणजीत सिंह चन्नी के साथ लामबंद हो गया है।

चरणजीत चन्नी के घर मोरिंडा में कांग्रेस हाई कमांड के फैसले पर असंतोष जताने के लिए इकट्ठा हुए पूर्व मंत्री और विधायकों ने पार्टी अनुशासन को दरकिनार करके एक नई लकीर खींच दी।  

सुखजिंदर सिंह रंधावा के कहने के अनुसार राजा वडिंग को यह गुट प्रदेश प्रधान के रूप में स्वीकार करके चुनाव में नहीं जाना चाहता और हाई कमांड द्वारा पिछले 2 महीने से की गई अलग-अलग बैठकों के बाद भी कोई फैसला जाने किन कारणों से सही नहीं किया गया। इस समूह का स्पष्ट कहना है कि कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को पंजाब में सभी परिस्थितियों से पूर्व में समय रहते अवगत करवाया गया था।

कांग्रेस हाई कमांड ने पंजाब की जमीनी स्थिति जानने के लिए तीन सदस्यीय कमेटी (अजय माकन, लक्ष्मी नटराजन और भजनलाल जाटव) का गठन करके पंजाब की विस्तृत रिपोर्ट भी हासिल की थी लेकिन फिर भी प्रदेश अध्यक्ष राजा अमरेंदर सिंह वड़िंग को बदला नहीं गया। वर्तमान परिस्थितियों के लिए पंजाब के असंतुष्ट धड़े के नेता हाई कमांड को जिम्मेदार मानती हैं।

पंजाब 117 सीट  विधानसभा सभा की है। सरकार बनाने के लिए बहुमत का आंकड़ा 59 विधायकों की आवश्यकता होती है।  2022 के चुनावों में दलों की प्राप्त सीटों की समीक्षा करें तो कांग्रेस को 60 सीट तक पहुंचने के लिए 42 सीट और चाहिए क्योंकि 2022 में वो केवल (18 सीट) ही जीत पाई थी। जबकि शिरोमणि अकाली दल को 57 और भाजपा को 58 सीट पर जीत हासिल करनी होगी।  

2022 में मालवा में 69 सीटों पर कांग्रेस लगभग साफ हो गई थी केवल 2 सीट ही जीत पाई। जालंधर, कपूरथला और गुरदासपुर में ही केवल कांग्रेस अपनी साख बचा पाई थी। दोआबा और माझा की 48 सीटों में से 16 सीटें ही जीत पाई थी। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजा वडिंग मालवा से हैं। हालांकि चरणजीत चन्नी मुख्यमंत्री की अगुवाई में कांग्रेस ने चुनाव लड़ा था लेकिन चरणजीत चन्नी स्वयं दो सीटों पर चुनाव लड़े और दोनों सीटों पर हार गए थे।

कांग्रेस में दलित चिंतक ग्रुप अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए प्रयासरत है। यह द्वंद वहीं से निकल रहा है। एक तरह से भाजपा की राजनीति में परोक्ष मदद हो रही है।

कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी भूपेश बघेल ने स्थितयों को संभालने के लिए एक गहन दौरा 5 दिन का पंजाब में किया है और सभी गुटों से अलग अलग मिल कर कोई रास्ता निकलने के प्रयासों में लगे है लेकिन फैसला अभी भी हाई कमांड को ही करना है जिसके लिए इंतज़ार किया जा रहा है। पंजाब में कांग्रेस की इस स्थिति को संभालने के लिए पंजाब के विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा, राणा गुरजीत सिंह और किसी समाधान की ओर ले जाने में प्रगट सिंह की महत्वपूर्व भूमिका और प्रयास किए जा रहे हैं।

अकाली दल के किसी भी धड़े की दूर तक सरकार बना लेने की संभावना है नहीं। कोई गठजोड़ भी सभी अकाली दलों में होना मुमकिन है ही नहीं। अकाली दल बादल की साख अब न्यूनतम पर है। अन्य अकाली धड़े अभी पूरे प्रदेश में स्थापित नहीं हो पाए। 12 -15 सीट तक की क्षमता सीमित है। इन सभी दलों में किसी गुप्त संधि को मिला कर भी सरकार आकार लेती दिखाई दे नहीं रही। आम मतदाता अभी कन्फ्यूजन में है।

पंजाब कांग्रेस का एक बड़ा गुट अड़ गया है। दिन प्रति दिन पंजाब में मतदाताओं के विश्वास को गहरा धक्का लग रहा है। यह स्थिति कांग्रेस को जीत की संभावनाओं से दूर ले जा रही है। पंजाब कांग्रेस की मौजूदा जद्दोजहद में प्रदेश में नेतृत्व परिभाषित करने के मसले के साथ साथ टिकट बंटवारे की अनिश्चितता के सवाल ने प्रतिस्पर्धा  को उग्र किया हुआ है।

पार्टी की प्रदेश की कार्यकारिणी की भूमिका ऐसी परिस्थितियों में संतुलन बनाने में अहम होती है लेकिन पिछले काफी समय से प्रदेश कार्यकारिणी अपना दायित्व निभाने में नदारद है। योग्यताओं के इतर वरिष्ठता या स्वीकार्यता को दावों के लिये प्रयोग किए जा रहे हैं। प्रदेश के उद्देश्यों और लक्ष्यों के लिए राजनीति से अलग व्यक्तिगत प्राप्तियाँ महत्वपूर्ण हो गई हैं। जीतने की संभावनाएं वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों से उत्पन्न होने के अनुमान को प्रमाण मान लिया गया है। 

इस उलझन का  निदान करने में केन्द्रीय नेतृत्व अगर अनपेक्षित निर्णय करेगा या विलम्ब होता है तो जनाधार में अविश्वास पसरने से अपेक्षित परिणामों से दूरी तय है। इस सारी घटना का मूल्यांकन परिणामों के बाद जब किया जाएगा तो शायद ही पश्चाताप के अलावा कुछ शेष मिले।

अब कांग्रेस के लिए चुनौती है कि कैसे सता तक पहुंचा जाए।

(जगदीप सिंह सिंधु वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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